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समेकित नैदानिक एवं संगठनात्मक मनोविज्ञान: सिद्धांत, मूल्यांकन और भारतीय अनुप्रयोग

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मानव मन जितना अद्भुत है, उतना ही जटिल भी। हम जिस दुनिया में जी रहे हैं, वहाँ जीवन की गति तेज़ है, अपेक्षाएँ ऊँची हैं, प्रतिस्पर्धा गहन है, और मानसिक दबाव निरंतर बढ़ रहा है। ऐसे समय में मनोविज्ञान केवल एक विषय नहीं—एक आवश्यकता बन चुका है। यह हमें यह समझने में मदद करता है कि व्यक्ति कैसे सोचता है, कैसा महसूस करता है, कैसे व्यवहार करता है, और किस प्रकार उसके भीतर की दुनिया बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित होती है। प्रस्तुत पुस्तक इसी व्यापक उद्देश्य को ध्यान में रखकर लिखी गई है—ताकि मन की परतों को समझने का यह सफ़र सुव्यवस्थित, गहन और सुलभ बन सके। इसमें नैदानिक और संगठनात्मक—दोनों ही परिप्रेक्ष्य एक साथ समाहित हैं, क्योंकि मनुष्य अपने भीतर व्यक्ति भी है और अपने बाहर एक सामाजिक–पेशेवर इकाई भी

मानव मन जितना अद्भुत है, उतना ही जटिल भी। हम जिस दुनिया में जी रहे हैं, वहाँ जीवन की गति तेज़ है, अपेक्षाएँ ऊँची हैं, प्रतिस्पर्धा गहन है, और मानसिक दबाव निरंतर बढ़ रहा है। ऐसे समय में मनोविज्ञान केवल एक विषय नहीं—एक आवश्यकता बन चुका है। यह हमें यह समझने में मदद करता है कि व्यक्ति कैसे सोचता है, कैसा महसूस करता है, कैसे व्यवहार करता है, और किस प्रकार उसके भीतर की दुनिया बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित होती है। प्रस्तुत पुस्तक इसी व्यापक उद्देश्य को ध्यान में रखकर लिखी गई है—ताकि मन की परतों को समझने का यह सफ़र सुव्यवस्थित, गहन और सुलभ बन सके। इसमें नैदानिक और संगठनात्मक—दोनों ही परिप्रेक्ष्य एक साथ समाहित हैं, क्योंकि मनुष्य अपने भीतर व्यक्ति भी है और अपने बाहर एक सामाजिक–पेशेवर इकाई भी

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